श्री हनुमान पंचक



॥ दोहा॥

संचक सुख कंचक कवच पंचक पूरन बान।
रंचक रंचक कष्ट ना हनुमत पंचक जान॥

(मत्तगयंद छंद)

ग्राहि नसाहि पठाहि दई दिवदेवमहाहि सराहि सिधारी।

वीर समीरन श्री रघुवीरन धीरहिं पीर गंभीर विदारी॥

कंद अनंद सुअंजनिनंद सदा खलवृंदन मंदजहारी।

भूधर को घर के कर ऊपर निर्जर केजुद की जरी जारी॥

बालि सहोदर पालि लयो हरि कालि पतालिहु डालि दई है।

भालि मरालिसि सीय करालि बिडालि निशालि बिहालि भई है॥

डालि डरालि महालिय राय गजालिन चालि चपेट लई है।

यालिहिं शालि दई गंध कालि कपाल उत्तालि बहालि गई है॥

आसुविभावसु पासु गए अरु तांसु सुहासु गरासु धरयो है।

अच्छ सबच्छन तच्छन तोरि स रच्छन पच्छन पच्छ करयो है।

आर अपार कु कार पछार समीर कुमार भरयो है।

को हनुमान समान जहान बखानत आज समान भरयो है॥

अंजनि को सुत भंजन भीरन सज्जन रंजन पंज रहा है।

रुद्र समुद्रहि धुद्र कियो पुनि क्रुद्ध रसाधर ऊर्द्ध लहा है॥

मोहिन ओप कहो पतऊ तुब जोप दया करु तोप कहा है।

गथ्थ अकथ्थ बनत्त कहा हनुमत्त तु हथ्थ समथ्थ सहा है।

भान प्रभानन कै अनुमान गए असमान बिहान निहारी।

खान लगे मधवानहु को सुकियो अपमान गुमानहिं गारी॥

प्राण परान लगे लच्छमानतु आनन गानपती गिरधारी।

बान निवाय सुजान महानसु है हनुमान करान हमारी॥

॥ दोहा॥

बसुदिशि औं पौराण दृग इक इक आधे आन।
सित नवमी इष इंदु दिन पंचक जन्म जहान॥
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